सोचती हूँ,
बीते यूँ ही जिंदगी के कुछ पल,
जैसे आने वाला हो कोई सुनहरा कल।
कैसे कहूँ किस 'काश' को लिए बैठी हूँ हृदय तल में अपने,
जिसकी उम्मीद पर देखे थे भविष्य के सपने।
ये मोड़ कैसा है?
कैसी है ये विडम्बना..
चाहती नहीं इस अंधी दौड़ का हिस्सा बनना,
दुनिया की इस भीड़ में कोई मामूली किस्सा बनना।
खैर,
अब भी हुई नहीं देर है,
जब जागो तभी सवेर है।
क्योंकि ....
"सोचती हूँ"
-ऋचा-

