जब भी कहीं इश्क़ की बात आई,


मेरे लबों पर सिर्फ हमारे अधूरे इश्क़ के मुकम्मल होने की इबादत आई!


क्यूं साथ नहीं हम, सोचा ये हर पल।


जाने कैसे भुला बैठे, वो साथ बिताए सुकूँ के पल !


आज भी कहने को कई ग़ज़लें कह दे हम।


लेकिन यादों की पोटली में सुर्ख लाल कपड़े में लपेट कर रखा है मैंने वो सब जो तुम छोड़ गए थे या यूँ कहूँ छूट गया था तुमसे, 


शायद कभी मिलेंगे तो कहूँगी तुमसे कि-


 "चाहे कहा ना हो क्यूं मोहब्बत है तुमसे,


लेकिन तुम पर हक़ मेरा है, खुद ज्यादा तुमसे "


-ऋचा-