अक्सर वो निकला करता था गलियों से
उस मासूका को देखने को
पर यह खबर उसको नहीं थी
वो तो अपनी बगिया में ही खुश थी
पर जवानी ने उसको ऐसा खींचा
कि वो उस माली के बगिए की एक मात्र कली थी
पहले तो दोस्ती रूपी बीज उगते हैं
फिर वही बीज ग्लानि बनते हैं
धीरे-धीरे मोह रूपी कीड़ा लगकर
दोनों की जिंदगी को विरह या सौंदर्यमय बनाता है
पर यह तो जिंदगी भर का मुकदमा होता है
कहीं खुशहाली तो कहीं गमों की बरसात लाता है
कहना आसान होता है
पर भुलाना उस मील के पत्थर जैसा है
जो हर वक्त अनंत का एहसास दिलाता है
हल्दी रंग लाती है
मेहंदी भी रंग लाती है
पर कैसे उन यादों को बेरंग करें
जो जिंदगी भर ग्लानि बन के रह जाती हैं


