तुम जो धीर-धीरे जा रहे हो
सब से दूर।
अपनी जुंबिश झोडते हुए,
मालुम होता है
तुम्हारे ज़हन में साँसें ख़त्म हो रही है।
जिस्म और रुह अपनी अपनी रफ़तार से चलने लगे है
जिस्म जल्दी थक जाता है
और रूह तुम्हारी अभी थकती नही।
वो और आगे जाना चाहती है,
लेकिन तुम हाफने लगे हो,
हमम, तुम ज़इफ़ हो गए हो।
देखो रुकना ज़रा
कुछ बरस बाद
मैं भी तुम्हें उस ही रास्ते पर मिलूँगा।
