मैं जब थक हारकर लेट जाता हूँ
किसी दुकान के छज्जे के नीचे,
शोर करती दुनियाँ रुक सी जाती है।
सर पर जलता टंगस्टन का बल्ब
रात में भी जलता सूरज दिखता है।
आँखें बंद कर लूँ तो
तो थकान थप-थपा कर,
सुला देती है मुझ को।
और फिर रात वही कटती है
सुबह फिर शोर जगा देता है मुझ को।
उफ.....
ज़इफ़ हो गया हूँ ,
अब वज़न उठता नही है।
ज़िंदगी का बोझ ढोते-ढोते थक गया हूँ मैं।
