ये पेड़ शमी का
यूँ दुआएँ देता है मुझ को
जब जाकर बैठता हूँ इसके नीचे
तो फुक देता है अपनी दुआएँ
झाड़ कर मुरझाई हुई पत्तियाँ
फिर में एक-एक कर बीनता हूँ
छोटी-छोटी पत्ती उस की।
जब हवा तेज़ चलती है तो
दुआएँ बड़ी दूर तक जाती है।
मैं तो ये सोच कर रुक जाता हूँ,
ना दैर-ओ-हरम है इसके पास
ना पादरी, ना मोल्वी और ना पंडित
फिर भी ये मुझे दुआएँ देता है
सो मैं भी ले लेता हूँ दुआएँ इसकी।

