ये सफ्हे ज़ींदा रिश्तों के,
लोग आहिस्ता से पलट दिया करते है।
लेकिन मैं मुर्दे पन्ने उलटा हूँ,
जो मर चुके है कई बरस पहले।
हर सफ्हा खोल कर देखता हूँ
हर हर्फ़ को उठाता हूँ
शायद किसी में जान बाकी हो
या तो कोई जुंबिश दिख जाए
या कोई हर्फ़ बोल पड़े।
लेकिन भला मुर्दे कहा उठते है।
ख़ामोश पड़े रहते है,
अपनी-अपनी कब्र में।

