तेरे होंठों पर रख कर होंठ अपने
समझा दी है मैंने
मुहब्बत की आयतें सारी।
रख कर फ़ाया होंठों का
भर दिये हैं ज़ख़्म।
पढ़ कर फ़ातिहा कानों में
फूंक दी है दुआएँ तुझ पर।
और चुन-चुन कर कई बोसे
चिस्पा कर दिए है जिस्म पर तेरे
जैसे मुहर लगा दी है
मैंनें तुझ पर ख़ुद की।
और तो सुबह के आग़ोश में
उफ़ुक़ से निकलते सूरज कि मद्धम रौशनी
मलकर हथेली से
तेरे चेहरे पर चढ़ा दी है।
हाँ अब तू मुक़द्दस हो गई है।

