वो जो तुमने
गीले-गीले बोसे दिए थे,
कुछ आहट दबा दि थी
अपने होंठो से,
और कुछ हर्फ़
चस्पा किए थे
मेरे जिस्म पर,
वो ख़ोल तेरी मुहब्बत का
उस रात को पहना था मैंने।
बोसीदा हो गया है, शायद
वो गीले नमी भरे बोसे,
सुखने लगे है अब,
वो आवाज़ जो दबा दि थी तुमने
अपने होंठो से
मेरे बदन पर,
मानो कि कुछ दिनों से
अब वो गूंगी हो गई है,
और हर्फ़ उभरने नगे है
सर्द पत्तो कि तरह,
टूट जाते मेरी शाखों से।
कि वो खोल मैंने उतार कर
रख दिया है।
भला कोई कितने दिन
किसी और कि याद
अपने बधन पर चढ़ाए रखे।

