थकने में कुछ महारथ सा है
 आजकल मैं कविताओं से थक जाता हूँ
 थोड़ा सोचा कम लिख पाता हूँ
 थोड़ा लिखा कम समझा पाता हूँ

फिर दोगलापन नही तो और क्या
सीधी चीरती धूप में छाता, और
खिड़की से छनती धूप में शब्द उठाता हूँ

मुद्दा ये बिल्कुल नही की क्या लिखा
तकलीफ ये कि जो ना लिखा उसका क्या
सारे सिद्धान्त तार तार हो जाते हैं
जब सुविधानुसार शब्द उठाये जाये
ग्लानि में मेरे सबसे पहले शब्द को पाता हूँ

जरूरी नहीं कि ढाँचों में विचार मारे जायें
विचारों से सिद्ध ढांचें ढाये जा सकते हैं
पर सारे वृतांत बरमबार उछल आते हैं
जब शब्दों को टोहने मेरे अंतर में कहीं
मैं खुद की खाई में खुद से धकेला जाता हूँ
                                          .............रV