कभी सरहदों की ऊंचाई पर
बर्फीली पुरवाई में
कभी साथियों संग
ख़यालों की गहरी तन्हाई में
याद आता है...जब
वीर जवानों को
माँ का दुलार
पिता का संस्कार
बहनों का त्याग
प्रियतमा का प्यार
बेशक़ कुछ पल...तब
हो जाती हैं आँखें नम
पर, भावनाओं की यही बयार
कर देती हैं रगों में..
असीम हौसलों का संचार
करने फिर...
उन कसमों को साकार
कि...मातृभूमि की रक्षा में
हँसकर कर देंगे, जां निसार
शूरवीर ये वतन-परस्त
सीने में रख, ऐसी हसरत
हर कदम, बेखौफ़ होकर
अथक बढ़ते ही जाते हैं
हो जंग का मैदान,
या सरहद की निगेहबानी
नहीं कोई इनका सानी
लहू के अंतिम कतरे तक
सेना के जांबाज़ बहादुर
अदम्य साहस दिखलाते हैं
कभी..जीत कर हर बाज़ी
फतह का जश्न मनाते हैं
और बड़े फ़क्र से
राष्ट्रध्वज लहराते हैं
कभी..ये योद्धा हिंदुस्तानी
सहर्ष बन जाते बलिदानी
माँ भारती की सुनकर पुकार
पहन कर "शहादत के हार"
कर वीरता का सर्वोच्च श्रृंगार
लिपट तिरंगे में आते हैं
शाश्वत अमर हो जाते हैं
और अंतिम...
सफर-ए-रुख़सत से भी
माटी का कर्ज़ चुकाने का
जज़्बा हर दिल में जगा जाते हैं
कर्तव्य-पथ पर,
हँसते-हँसते...मर-मिट के
बेटे जब...वीर-गति पा जाते हैं
ऐसे सपूतों के माँ पिता
ग़म के अश्क़ नहीं बहाते हैं
पूछे कोई तो कहते हैं...
हाँ...खो दिए हैं अपने "लाल"
काश ! होते गर, और नौनिहाल
जलाते..देश-प्रेम की मशाल
घर के चराग़ों के बुझने का
मातम हम नहीं मनाते हैं
इस बात पे इतराते हैं..
कि...शहीदों की जननी
और जनक कहलाते हैं
- अभिषेक


