मुल्कों को चाहिए ज़मीं का विस्तार
होती है तो हो जाए मानवता शिकार
फिर चाहे हो बे-इंतिहा दहशत हर-सू
या कि बहता रहे बे-क़ुसूरों का ख़ूँ
लड़ेंगे शिद्दत से ज़िद की लड़ाई
मारेंगे, मरेंगे, पर मानेंगे नहीं हार
थमेगा झुकेगा क्यूँ कोई इतनी जल्दी
अभी तो है ये इब्तिदा-ए-टकरार
- अभिषेक
