तसव्वुर में तुम्हारे

गुम हो कर

संग गुज़रे हुए

हसीन लम्हों की 

अंजुमन सजा ली है

जाम-ए-चश्म-ए-सनम

मयस्सर तो नहीं

कि सरशार हो जाऊँ

पर, मौज़ूदगी का तेरी

एहसास हो,

इसलिए, चाय मैंने

दो प्याली बना ली है


लबों से लगाया मैंने

पहले तुम्हारी प्याली को

हर घूंट में लगा जैसे

तेरे कोमल अधरों का स्पर्श

मीठी इतनी तो

शक्कर भी नहीं होती

सिफ़त है यक़ीनन ये

तुम्हारी यादों का

तुम्हारे नाम का

तुम्हारे ख़याल का

कि तुमसे जुड़ी हर चीज़ में

घुल जाता है मधुर प्रेम-रस


चुस्की ली जब

अपनी प्याली की

न थी उसमें कोई मिठास

जानती हो ना क्यूँ ! 

बिन तुम्हारे, 

कुछ भी मेरा

होता नहीं है खास

तेरे हिज्र का ये है सबब

चाय की ही बात नहीं, 

है सब कुछ ही

फीका फीका सा अब

रहती हो तुम जो रू-ब-रू

मैं होता हूँ ख़ुद-शनास

तू नहीं गर आस-पास

हर शय है गोया उदास


      - अभिषेक