जब तक रहा वो
बेटा और भाई
रिश्तों में थी गहराई
आती थी घर-आँगन में
अपनेपन की धूप रोज़ ही
चलती थी साथ साथ अक्सर
संवेदनाओं की परछाईं
ज्यों ही बना वो "पति"
न जाने कहाँ गई मति !
भावनाओं में हुई इतनी क्षति,
कि चंद ज़िम्मेदारियां
जो थीं उसको निभानी
जन्म देने वाले के प्रति,
भूल गया वो भी
सहज इक पल में I
याद रही तो बस "श्रीमती"
- अभिषेक
