दो रोज़ हुए, गुफ़्तुगू नहीं हुई तुझ से

लगता है गोया मुद्दतों से ग़म-ज़दा हूँ मैं

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रूह तो, कब की निकल चुकी है

ढो रहे हैं फ़क़त, वज़्न-ए-जिस्म को

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गर इश्क़ ख़ुदा है, बुतान-ए-इश्क़ तू है

मेरे ज़ीस्त की, मुसलसल ज़रूरत तू है

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तेरा मेरा राब्ता ज़माने की नज़रों में

मुक़द्दस तो नहीं, लेकिन

दिल पर दस्तक तूने,

ज़माने से पूछ कर तो नहीं दिया ! 

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इक तुम्हारी सदा ही तो, 

थी जीने की वजह, हम-नफ़स

वो भी नहीं अब

है इज़्तिरार, मेरी ज़िंदगी में हर-नफ़स

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फ़ना हो रहा हूँ तेरी कमी से

ज़रा-ज़रा, रोज़-रोज़

लौट आ, इक बार फिर से

ऐ मेरी हयात-अफरोज़

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थी गुलज़ार, राह-ए-उल्फ़त

रफ़ीक़ थे तुम, जब तलक

बिन तेरे, है वीराँ सा अब

मेरी ज़मीं, मेरा फ़लक

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चराग़ मोहब्बत का बुझा कर

ज़ीस्त में तीरगी फैलाई है

आरज़ू-ए-वफ़ा, क्या करूँ उन से

जिस ने फ़र्ज़-ए-जफ़ा निभाई है

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ग़ैर कोई जब ग़म दे जाए

हम, अपनों को दर्द बताएं I

गर अपनें ही ठेस लगाएं

नैन कहाँ फिर, अश्क छुपाएं II

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जीने की हसरत तो नहीं, 

सज़ा मिली है जीने की I

नाराज़गी लबों की, तबस्सुम से

यारी अश्कों से, अँखियों की II


        - अभिषेक