इश्क़, मोहब्बत, उन्स
प्रेम, उल्फ़त, प्यार
समझ सका न कोई
इस शय का असरार
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क्या नाकाफ़ी था ये क़हर-ए-जमाल
जो कर रक्खा है अधरों को भी लाल
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नफ़रत को करने दो बेइंतिहा कोशिश,
उल्फ़त के आगे नाकाम होना ही
मुस्तक़बिल है उसका ||
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कौन कहता है कि शायरी का हुनर,
सनम की बेवफ़ाई से आता है |
देखा महबूबा को मैंने जिस रोज़ भीगते,
मुझे लिखने का सलीक़ा आ गया ||
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काला लिबास, काली ज़ुल्फ़ें
और उस पे, कजरारे नैन |
न जाने आएगी आफ़त किस किस पे,
किस किस का जाएगा, क़रार चैन ||
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कुछ कर्म फर्ज़ होते हैं,
किसी पर एहसान नहीं |
कुछ लफ़्ज़ मुझे भी रुलाते हैं,
आख़िर मैं भी हूँ इन्सान ही !
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- अभिषेक
