गर सफलता की कसौटी
घर-बंगले, ऊँची कोठी
महँगी गाड़ी, पूंजी, जमा धन
फिर तो, यकीनन
हूँ असफल मैं
क्यूँकि..
नहीं पास मेरे
ऐसे वैभव संसाधन
पर, सत्य तो, ये भी कथन ...
" करके कर्तव्य पालन
और मन का समर्पण
माँ-बाप की सेवा की दौलत
किया जिसने भी अर्जन
वे ही सफल हैं
वे ही संपन्न "
इसलिए,
करता हूँ बड़ी शिद्दत से
जननी-जनक की देखभाल
रखकर बस उनकी
"चंद ज़रूरतों" का ख़याल
हो गया इस कदर निहाल
जैसे परम सुख से मालामाल
हर्षित भावना से, उनपर
करके अंशमात्र ही अर्पण
सार्थक कर लिया
मैंने अपना जीवन
यूँ तो, नहीं मैं, पुत्र "श्रवण"
पर नित यही, करता हूँ प्रयत्न
सेवा-धर्म और कर्म-निष्ठा से
माता-पिता को, कर सकूँ प्रसन्न
जिस लम्हा, जिस पल
होगी यह साधना मुकम्मल
हो जाऊंगा मैं, सबसे सफल
पड़ेगी तब, मेरे अंतर्मन में
सुकून की जो छाया,
वही होगा, ज़िंदगी का
सबसे अनमोल सरमाया
- अभिषेक


