कहाँ निकले हो तुम भी !

ढ़ूँढ़ने इस जहाँ में

भरत, शत्रुघ्न, राम-लखन

लौट आओ,

नहीं मिलेंगे !

गुणों के वो चार स्तंभ

कर लो पूरी धरा भ्रमण

व्यर्थ ही होगा प्रयत्न

क्यूँकि, अंशमात्र भी

नहीं मिलते अब !

दशरथ-नंदन जैसे

नायाब अनमोल रत्न


था अलग ही वो दौर, जब

प्रेम, सद्भाव चारो ओर

जीवन-मंत्र करुणा, त्याग

निःस्वार्थ परस्पर अनुराग

सरल, विनम्र लोग सज्जन

परहित को आतुर मन

हृदय संस्कारों का दर्पण

अति सहज सर्वस्व अर्पण

ग़ैर भी इतने कर्तव्यनिष्ठ

जैसे, बंधन उनसे हो घनिष्ठ

पग पग पर, मानवता के दर्शन

वचन के लिए प्राण समर्पण

ख़ुशनसीब थी हर एक काया

जिसने भी तब जनम पाया

प्रकृति हर पल मुस्काती थी

ऐसी रामयुग की ख़्याति थी


विपरीत, आज का परिवेश

कपट, घृणा, जलन, द्वेष

ना जाने कैसा है चलन

शोहरत मिले एक को

तो दूजे के, माथे पर शिकन

कैफ़ियत ऐसी कि,

बस होड़ है मची

कौन कितना कर सकता

धन-संसाधन, वैभव अर्जन

काटो गला, या करो फ़रेब

चाहे जैसे भी, भर लो जेब

आगे बढ़ने की ऐसी चाह

ईमानदारी लगती गुनाह

हर-सू है अत्याचार

और चरम पर भ्रष्टाचार

सगे-संबंधी, बंधु-सखा

हैं सब मतलब के नाते

मिलता नहीं मन से मन !

संवेदनाओं ने ओढ़ा कफ़न

हो गई सब भावनाएं दफ़न

नहीं रहा रिश्तों में "नमक "

फ़ीका पड़ गया, अपनापन


                - अभिषेक