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पापा


मौन संघर्षों की घर्षण सेटूट जाती हैं चप्पलें उनकीहो जाती है जूतों में सुराखफिर भी हमारी ख़ुशियों के वास्तेतज देते हैं अपनी तमन्नाएँ लाखबस पापा ही कर सकते हैंअपने तमाम सपनों को राख

— अभिषेक
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