ज़िम्मेदारियों से भागोगे
कब तक, यूँ चुप रहकर
झाँको ज़रा ...
मेरे आँगन में
देखो ...
कैसा टूटा है क़हर !
माँ की कोख़ उजड़ी
मैं, पिता से कह बिछड़ी
"फ़ना होगा न जाने कब !
ख़ौफ़ का यह मंज़र
मोमबत्तियां तो जलेंगी
बरस, दो बरस
मेरी भी तस्वीरों पर
भूल जाएंगे लोग सारे
फिर से, बस यही कहकर ...
"क्या करें ! ज़माना ख़राब है"
ख़ामोशियाँ गूँजेंगी !
कहेंगी चीख चीख कर
अब बहुत हुआ !
महफ़ूज़ करो
बची हुई हर उस
"निर्भया" को,
जो कोने कोने में कहीं
सहमी बैठी होंगी छुपकर
- अभिषेक
