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"नारी" पुरूषों का दायित्व नहीं

कौन कहता है कि सीमाएँ इनकी
बस घर-आँगन की चार-दीवारी
जान चुकी है दुनिया ये सारी
कितने आयाम छू सकती है नारी

हर-सू लहराया परचम, बाज़ी मारी
छात्रों पर पड़ती हैं छात्राएँ भारी
कई परीक्षाओं में आती हैं अव्वल
आकाश भर नित सफल है नारी

कर्तव्य निर्वहन में कभी ना हारी
ना फ़क़त परिवार की जिम्मेदारी
सुबह से शाम, घर-बाहर सब काम
अथक सहज कर लेती है नारी

किस क्षेत्र में नहीं है भागीदारी ? 
Tag: poetry और3 अन्य
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