माँगी गई बड़ी मन्नत दुआ
तब कहीं ख़ुश हुए ख़ुदा
मिला आशीष, हुआ बबुआ
शुक्रिया कह कर,
प्रभु को शीश झुकाया
बड़े लाड से फिर
गोद में उठाया
माथे पे काला टीका लगाया
लोरी गा गा कर
कहानी सुना कर
रातों में उठ उठ कर
बड़े जतन से
सीने से लगा कर सुलाया
उँगली पकड़ चलना सिखाया
मेले में काँधे पे चढ़ाया
मनचाहा खिलौना दिलाया
पढाया लिखाया क़ाबिल बनाया
जवाँ हुई औलाद तो
ढूंढा उसके वास्ते एक हाथ
न जाने थी क्या
उन हाथों में ऐसी बात
कि थामते ही,
लाडला भूला रिश्ते सारे
अनमोल बंधन जज़्बात
उठे थे दुआओं में जो हाथ
उन्हीं को झटक कर
चल दिया, वो घर को तज कर
लगे सोचने जन्म देने वाले
बूढ़े लाचार को कौन संभाले !
बह रही थीं बेबस आँखें
नहीं हो रहा था मन को विश्वास
कि "कलेजे का टुकड़ा"
जा रहा है छोड़
नए नातों के लिए
माँ-बाप का साथ
- अभिषेक
