मातृ दिवस पर, मेरी ये कुछ पंक्तियाँ हर माँ को समर्पित हैं !
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अनंत वेदना को सहकर जो
जननी का स्वरूप पाती है
वो माँ कहलाती है
ग़म के हर दरिया को समेट
सुख का सागर बन जाती है
वो माँ कहलाती है
संघर्ष की अगन में तपकर भी
जीने का सबक सिखाती है
वो माँ कहलाती है
सब खताओं को भूल कर
करुणा का गागर छलकाती है
वो माँ कहलाती है
निज स्वार्थ से परे रहकर
ममता का धर्म निभाती है
वो माँ कहलाती है
वसुधा सी विशाल होकर
सबको हृदय में बसाती है
वो माँ कहलाती है
बेख़बर हो, अपनी क्षुधा से
बच्चों का पेट भर जाती है
वो माँ कहलाती है
तपिश भरी लंबी निशा में
शीतलता का आभास कराती है
वो माँ कहलाती है
जीवन-रण के हर क्षण में
दुआओं का कवच पहनाती है
वो माँ कहलाती है
खुद गरल घूंट पी कर भी
आँचल से सुधा बरसाती है
वो माँ कहलाती है
लफ़्ज़ों में जो न समाती है
अपरिभाषित ही रह जाती है
वो माँ कहलाती है
- अभिषेक


