बिसात-ए-हयात पर मैंने
लगाया दाँव-ए-जज़्बात
ख़ुद-ग़र्ज़ सारे आते गए
हर बाज़ी मुझ को हराते गए
हार कर जब मैं उठा
मेरे अक्स ने मुझ से कहा
झूठ नहीं बोलूँगा तुझ से
देख रहा था मैं भी कब से
साज़िश के इस खेल की
कुछ अलग ही थी तस्वीर
तू एक मोहरा, वो भी प्यादा
थे कई सारे शातिर वज़ीर
- अभिषेक

