क्या याद है तुम्हें वो जगह ?

किया था हम ने जहाँ,

एक ख़ूबसूरत गुनाह I

था ख़ुदा के सिवा

न कोई दरमियाँ वहाँ I


थोड़ी थोड़ी थी तुम सहमी

था मैं भी ज़रा ज़रा डरा

ना तुम थी दुल्हन के लिबास में

ना मैं किसी परिधान खास में

फ़क़त शर्म ही था वो गहना

तुमने जो उस पल था पहना


मिला कर मेरी अँखियों से

अपने दो प्यारे नयन

धीरे से फिर तुमने कहा ...

ओ मेरे प्रियतम

ओ मेरे सजन

क्यूँ तेज़ हो रही धड़कन ?


मैंने कहा.. ऐ जाने जाँ

कितनी मासूम भोली

तुम हो ग़ज़ब

अरे हम पहले यूँ मिले हैं कब !

उस पर तन्हाई का सबब

है इतनी बेचैनी तो लाज़मी

आ कर मेरी बाहों में

भर लो ठंडी आहें भी अब

परेशां न हो इस क़दर

उल्फ़त करने वालों के संग

हर लम्हा होता है रब


मेरी बातों का सुकूँ था

कि मेरे आग़ोश की कशिश

सर्द मौसम का कुसूर था

कि गर्म साँसों की तपिश

आलम-ए-मदहोशी में

ऐसे तू मुझसे लिपट गई

जैसे मुझमें ही सिमट गई

उस पल में हया तेरी

जाने कहाँ फ़ना हो गई !


साँसें हुईं जो थोड़ी मद्धम

तुम कहने लगी ....

क्यूँ करते हो बेक़रार

अब देर ना करो हमदम

कर दो मेरा वही श्रृंगार II

खिल जाती है,

हर नारी जिससे I

आता जाता है,

रुख़ पे निखार I


चूमा मैंने मुखड़ा तुम्हारा

मेरे हाथों में था तेरा हाथ

समझ गया था मैं प्रिये

तुम्हारे वो सारे जज़्बात

इश्क़ में तो पहले ही

सज-सँवर चुकी हो तुम

पूरी कर दूँ ये आरज़ू भी,

आ भर दूँ मैं

माँग में सुर्ख़ कुमकुम

ख़बर न थी मुझ को

छलकेगा ऐसा तेरे

सौंदर्य का गागर

होश मेरे हुए यूँ गुम

गोया पी लिए कई साग़र

सोलह श्रृंगार भी मिल कर

कर न पाते ऐसा कमाल

क्या ख़ूब था तेरा जमाल

सादग़ी में भी सनम

ढ़ा रही थी ऐसा सितम

जी कर रहा था

तेरे हुस्न पर

लिख दूँ कोई नज़्म

करना था क्या क्या नहीं बयाँ

पर अल्फ़ाज़ हो रहे थे कम

ओ मेरी स्वपन परी

चश्म-ए-बद-दूर

अप्सरा लग रही थी तुम


- अभिषेक