कोरोना काल के शुरुआती दिनों में लिखी गईं कुछ पंक्तियाँ :---


कोरोना का विकट संकट गहराया

मानव जाति पर ख़तरा छाया

बेबस ही चली गईं कई जानें

सम्पूर्ण विश्व सहमा घबराया


लेकिन हौसला नहीं हारेंगे

जंग ये भी जीत ही जाएंगे

धैर्य संयम से, घर पर रहने का

गर, हम सबने संकल्प उठाया


हैं मुश्किल अभी हालात

पर भूलकर मर्म जज़्बात 

समाज के शैतान दरिंदों ने

अपना क्रूर चेहरा दर्शाया

इंसानियत को चोट पहुँचाकर

रक्षक पर ही हाथ उठाया

मानवता के सेवक पर

न जाने क्यूँ पत्थर बरसाया


हों नतमस्तक हम उन वीरों पर,

डटे हैं जो अपने कर्तव्य पथ पर

हर क्षण जीवन जोखिम में कर

स्वार्थ भावना से परे रहकर

मानव सेवा को ही अपनाया

और विषम, प्रतिकूल घड़ी में 

मदद का सर्वोपरि धर्म निभाया


श्रेष्ठ प्रधान के संबोधन पर, जब

देशवासियों ने किया अमल

करने "कोरोना योद्धाओं" को नमन

हुए एकजुट, दिया अनोखा संबल

कृतज्ञ भारतवासियों ने सहर्ष, तब

क्या ख़ूब उनका मनोबल बढ़ाया

विविध ध्वनि गूंज से, सम्मान में

ताली, थाली, घंटी व शंख बजाया


कोरोना के घोर अंधकार से

कहीं हौसला टूट न जाए

एकांत और अकेलेपन में

न कोई विचलित हो पाए

ऐसी आशंका को भगाने,

हैं साथ सब, ये एहसास कराने

"प्रधान" फिर से आगे आए

मनोरम एक विचार बताए

करें, रात्रि पहर रौशन जग सारा

घर, आंगन, चौखट, गलियारा

कहा कि, भय का तिमिर मिटाएं

नौ मिनट के चंद लम्हों में ही

उम्मीदों का अनंत अलख जगाएं


देश के मुखिया के नेतृत्व में

जन मानस ने पूरे जोश में

कोना कोना जगमग करके

चैत्र में भी प्रकाश-पर्व मनाया

अद्भुत अनुपम इस अंदाज़ में

राष्ट्र एकता का संदेश फैलाया


- अभिषेक