जीवन पथ पे पग बढ़ाए जा रहा हूँ
ब-मुश्किल दिन बिताए जा रहा हूँ
रूठा है ख़ुशियों का साज़ मेरा
गीत ग़म के गुनगुनाए जा रहा हूँ
ठेस बे-इंतिहा लगाई है अपनों ने
मिले ज़ख़्मों को सहलाए जा रहा हूँ
समझदारों में तमाशा न बन जाऊँ
ऐसी महफ़िलों से दूरी बनाए जा रहा हूँ
आसाँ नहीं खोलना रिश्तों की गिरह
मतलबियों को समझाए जा रहा हूँ
मुक़द्दर में मेरी वफ़ा ही नहीं शायद
धोखा बार-बार खाए जा रहा हूँ
अच्छा किया जो अहबाब न बनाए
यूँ भी हर राब्ता ठुकराए जा रहा हूँ
कहा नहीं ग़लत को सही कभी मैंने
दिल की सुनने का दस्तूर निभाए जा रहा हूँ
सेवा-समर्पण का मकसद है दौलत
तोहमत ये ख़ुद पर उठाए जा रहा हूँ
अपने वास्ते नहीं, अपनों के लिए जिया
इसी बात की सज़ा पाए जा रहा हूँ
क़ुर्बत से अब लगता है डर इस कदर
फ़ासलों से दिल लगाए जा रहा हूँ
आरज़ू जीने की बाक़ी नहीं यारों
साँसों से दामन छुड़ाए जा रहा हूँ
- अभिषेक

