सुख के जंक्शन से गुज़रती है

दुःख के हॉल्ट पर ठहरती है

ज़िंदगी क्या है ?

रेल जैसी ही तो है

जैसे इसके कई पड़ाव

वैसी जीवन की धूप छांव


हम मुसाफ़िरों के पास

इस सफर-ए-हयात में

कर्मों की, जैसी टिकट

मिलता अनुभव वैसा ही

कहीं हैं मंज़र ख़ुशियों के 

कहीं रूबरू, हालात विकट


हैं दोनों यात्राओं की कुछ शर्तें

पर, जब जब पालन न करते

अनचाहा परिणाम भी पाते

कुछ, लेकर सीख संभल जाते

कुछ, बेबस नियति पर चिल्लाते


हो रेल, या हमारी ज़िंदगानी

संकट, विपदा आनी जानी

सबक ये है, कि अब मानें हम

अनुशासन क्या है, ये जानें हम

बेशक़, लक्ष्य और मंज़िल के दरम्यां

लंबे फ़ासले या कुछ दूरी है

लाज़मी, बाधाएं और मज़बूरी है

नहीं भूलनी जो बात, वो ये, कि

हर डगर पर, संयम ज़रूरी है


चाहे हो कोई भी रहगुज़र

नियम, दायरे जब टूटते हैं

भारी मोल चुकाना पड़ता है

कभी अर्थ दंड देना हो तो, 

सस्ता भले ही लगता है

कभी लाख कोशिशें करके भी, 

कीमती जानों को गंवाना पड़ता है


           - अभिषेक