है ये सारे जीवों का जीवन
इससे ही हरी भरी है धरा
लहलहाते खेत और उपवन
पर्वतों से गिरता हुआ झरना
मदमस्त झूमता हुआ सावन
पा कर इसे खिलता है सुमन
जलधि से आलिंगन करती सरिता
कलकल बहती ही रहती है सदा
पावन रूपों में गंगा यमुना नर्मदा
कंचन कर देता है सबका ये तन
प्यासे का यही तृप्त करता है मन
है लाज़मी सबके लिए ही पानी
बिन इसके नहीं कोई ज़िंदगानी
अमृत सा है, जब रखोगे निर्मल
दूषित जो हुआ तो, बनेगा गरल
मिल कर सभी नित करें पहल
व्यर्थ होने न दें, एक बूँद भी जल
- अभिषेक

