मोहब्बत की इंतिहा

ज़ाहिर करने के लिए

लाज़मी नहीं कि

"ताज" ही बनाया जाए

हर आशिक़, यूँ दौलतमंद

तो नहीं होता


उल्फ़त जताना हो तो

क्या ये कम है कि

कभी कभी माशूक़ा की

उलझी लटों को सुलझाया जाए


हो जब महबूबा की आँखें नम

किसी बात, किसी ग़म से

क़ीमती गौहर-ए-अश्क को

अपने दामन से उठाया जाए


तन्हाई में भी प्रियतमा को

तन्हा इक पल न रहने दूँ 

बदन पे बारहा उसके

लम्स का एहसास कराया जाए


सज सँवर के माह-रु

आए जब रू-ब-रू

तारीफ़ में उसकी

कोई नज़्म सुनाया जाए


रूठने की गुस्ताख़ी जो

दिलबर ने की हो तो

अंदाज़ अपना भी ऐसा हो

कि जब तक न माने वो

लबों रुख़ रुख़्सारों पे

बोसा दे दे कर मनाया जाए


         - अभिषेक