अपनों के रूबरू बेबस अचेतन लाचार
चाहत थी टूट जाए जीवन साज़ का तार
पर साँसें थमने से करती रहीं इनकार
चिकित्सकों ने किया हर वांछित उपचार
हो न सका पर, जीवन का नव-संचार
तेरह बरस हर लम्हा मौत का इंतज़ार
रही न जब ये आस भी कि होगा चमत्कार
गरिमामयी मरण का माँगा गया अधिकार
की गई अदालत से इच्छा मृत्यु की गुहार
हुई मुकम्मल आरज़ू, छोड़ गया संसार
मर कर दे गया अनमोल दृष्टि का उपहार
कोई उसकी आँखों से करे जहाँ का दीदार
इक हादसा और मुद्दत तक मौन चित्कार
हरीश राणा की वेदना का ये मार्मिक सार
- अभिषेक