ख़ामोश बैठे यूँ ही जब

भीग जाती हैं पलकें

अश्क़ों में तेरा ही अक्स

उभरता सा क्यूँ है


भुला दिया जिसे

मुद्दतों पहले हमने

रह रह कर वही ख़्वाब

पलता सा क्यूँ है


सोचा था न रोएंगे अब

कभी याद तुझे करके

आँखों में फिर ये सैलाब

उमड़ता सा क्यूँ है


एहसास है मुझे

जिन कसमों का तेरी

दिल उनपर ऐतबार से

मुकरता सा क्यूँ है


सुना है अक्सर लोगों से

है उल्फ़त इक सज़ा

रफ़्ता रफ़्ता कोई इस शय से फिर

मरता सा क्यूँ है


- अभिषेक