कहने लगी

इक रोज़ वो

हो कर मुझसे नाराज़

ख़्वाहिश नहीं कि माँगू

क़ीमती गौहर ज़ेवरात

हसरत ये भी नहीं कि

बनवा दो तुम भी

मेरे लिए हसीन "ताज"

बस इस बात का, 

आज दे दो जवाब

क्यूँ नहीं कभी तुमने

प्यार से दिया मुझे

महकता सा सुर्ख़ गुलाब


हँसने लगा सुन कर मैं

उसकी आरज़ू भरे जज़्बात

समझाया नादान को

आप ख़ुद हैं गुलाब सी

क्या दूँ आपको गुलाब ! 


शाम-ओ-सहर

देखता हूँ जो तेरा

हुस्न-ओ-शबाब

मिल जाता है

मेरी आँखों को

आब-ए-गुलाब


बोसा देती हो जब

मेरे अधरों पे तुम

महसूस होता है

लम्स-ए-दो गुलाब


आती है आग़ोश में तो

लगता है यूँ मुझको

है बदन पे तुम्हारे

गुलाब का ही लिबास


ऐ गुलबदन,

होता है हर लम्हा

हर पल मुझे आभास

तुम्हारा कोमल एहसास

और मीठी भी है तू

इस कदर, कि

जी चाहता है

रख दूँ नाम तेरा

"गुलाब खास"


ये सच है कि

इज़हार-ए-उल्फ़त के वास्ते

है फूल ही

ख़ूबसूरत ज़रिया, लेकिन

लफ़्ज़ों से

प्रेम ज़ाहिर हो तो

ये अदा भी

है बेहतरीन बढ़िया

अपनी तारीफ़ यूँ ही

जो रोज़ रोज़

सुनती रहेंगी आप

तो यकीं कीजिए जनाब

अब कभी ना माँगेंगी

सनम मुझसे "गुलाब"


     - अभिषेक