ऐ ग़ज़ाल-चश्मतू फ़क़त नहीं इक जिस्महै बेशक़ कोई तिलिस्मन देखा कभी जहाँ मेंहुस्न-ओ-जमाल का ऐसानायाब, नादिर क़िस्म
ऐ ग़ज़ाल-चश्मतू फ़क़त नहीं इक जिस्म
है बेशक़ कोई तिलिस्मन देखा कभी जहाँ में
हुस्न-ओ-जमाल का ऐसानायाब, नादिर क़िस्म