ऐ ग़ज़ाल-चश्म
तू फ़क़त नहीं इक जिस्म
है बेशक़ कोई तिलिस्म
न देखा कभी जहाँ में
हुस्न-ओ-जमाल का ऐसा
नायाब, नादिर क़िस्म
- अभिषेक


ऐ ग़ज़ाल-चश्म
तू फ़क़त नहीं इक जिस्म
है बेशक़ कोई तिलिस्म
न देखा कभी जहाँ में
हुस्न-ओ-जमाल का ऐसा
नायाब, नादिर क़िस्म
- अभिषेक