दिखता है अब तो हर-सू
रोज़ ही भयावह मंज़र
ग़रीबों को छलनी करता
अमीरों का बे-रहम ख़ंजर
कहीं सलामती के लिए
दुआओं में उठते, लाखों हाथ
कहीं अंतिम विदाई पर
नहीं मिलता कंधों का साथ
गर हो जाए बीमार
बबुआ कोई "राजकुमार"
तो करने ससमय उपचार
बंगले, आशियानों पर जाना
डॉक्टर बाबू को है मंज़ूर
लेकिन,
उन "मासूमों" का
क्या कुसूर ?
हैं इलाज से जो, कोसो दूर ....
टूटता है दम, तड़प कर
कभी अस्पतालों के दर पे,
और कभी
माँ-बाप की गोद में ही
मर जाने को हैं मजबूर
बेबस लाचार की आशाएँ
नित होती हैं चकनाचूर
मर चुकी संवेदना अब
हृदय हो गया निष्ठुर
होते यज्ञ, पूजन और हवन
क़ीमती जानों के लिए, अक्सर
सस्ती ज़िंदगियों को तो
कफ़न भी नहीं मयस्सर
- अभिषेक


