मनाया जाता है
खास कोई दिवस
जब जब
दिखने लगते हैं
लोग ज़्यादा समझदार
तब तब
आया 5 जून, तो हुआ
प्रकृति से प्यार बेशुमार
अगले दिन से
अगले बरस 4 जून तक
फिर से ग़ैर जिम्मेदार
तिथि मार्च 8 हो तो
नारी, दुर्गा का अवतार
होने लगता है रोज़ फिर
अत्याचार और तिरस्कार
मिलता है 5 सितंबर को ही
शायद यह दैवी ज्ञान
कि करना है
गुरु, शिक्षकों का सम्मान
फिर भूल कर उनकी ही सीख
छात्र छात्रा करते कदाचार
है कैसा ये व्यवहार !
कहें गुरु-दक्षिणा इसे
या गुरुओं का अपमान
मनाते हैं जोश जुनून से
जश्न-ए-आज़ादी और गणतंत्र
करके वतन से मोहब्बत,
तिरंगे को सलाम |
मिलता है मौका ज्यों ही
बन कर लालच के गुलाम
लूट लेते हैं राष्ट्र-धन
कुछ भ्रष्ट और बेईमान
नहीं होती इतनी समझ
घटती आख़िर इससे भी
देश की ही शान
"एक दिवसीय समझदारी" की
ऐसी अनोखी अद्भुत परंपरा
साल दर साल
बड़ी शिद्दत से, निभायी जाती है
वैसे तो, हैं कई और भी
दिन ऐसे विशेष
ज़िक्र जिनका है शेष
बात प्रासंगिक ये नहीं
दिन, उत्सव हैं कितने
कब कब मनाए जाते हैं
ज़रूरी है चिंतन, क्यूँ हम
जिम्मेदारियों के नाम पर
कर्तव्य, कर्म, दायित्व,
संस्कार और संवेदना की
औपचारिकता किए जाते हैं
और जागरूक समझ ख़ुद को
अपनी ही पीठ थपथपाते हैं
गर लाना है बदलाव तो
समझनी होगी यह बात
जिम्मेदारी है एक एहसास
नहीं पल भर का जज़्बात
महज़ एक दिन जलने वाली
ये लौ बुझानी होगी
दिलों में फर्ज़ की
अखंड ज्योति जलानी होगी
- अभिषेक


