मित्रता है वो दर्पण जिसमें
रुख़ दोस्तों के, दिखते हसीन
बेहद अनमोल है ये रिश्ता
थोड़ा मीठा, थोड़ा नमकीन
सजती है अंजुमन जब यारों की
कई अंदाज़ रू-ब-रू होते हैं
कुछ मस्तीजादे होते हैं,
कुछ शरारती, शायर शौकीन
फ़ना हो जाती है तन्हाई
ख़ुशियों के जाम छलकते हैं
संग झूमते हैं साथी सारे
नहीं रहता फिर कोई ग़मगीन
मित्र हो, चाहे दो, या तीन
पर, सच्चे, खास और बेहतरीन
ज़रूरी नहीं, मिले कोई कृष्ण
या कोई सुदामा दीन
हो निभाने का जज़्बा गर,
नाता दोस्ती का सबसे रंगीन
- अभिषेक

