टूट गया ना तेरा भ्रम !
क्या हुई मुक़म्मल आरज़ू !
"समझेंगे, मुझको समझने वाले"
अक्सर यही कहता था तू
अरे नादाँ ! ज़रा संभल
हक़ीक़त से हो रू-ब-रू
होती है झूठे ख़्वाबों की
बारहा ऐसी ही ताबीर
ज़माने ने मुक़द्दर को तेरे
मुद्दतों जाना अपनी जागीर
रच ले अब निज हाथों से
इक नई दास्ताँ-ए-तक़दीर
- अभिषेक


