किन लफ़्ज़ों में, दूं मैं बधाई
दिल से बस यही, दुआ है आई
संग चल रहे हैं
जिस पथ पर, बनके हमराही
वहाँ ख़ुशियों की धूप हो
न हो कोई, ग़म की परछाई
क्या ख़ूब थी वो प्यारी शाम
हैं यादों में अब भी, वो लम्हें तमाम
शुभ लगन की धुन, ऐसी गूँजी थी
मानो कायनात भी झूमीं थी
बुनकर कई सपने,
आरज़ू, एहसास
लेकर नई आशाओं के जज़्बात
मुस्कुराकर किया आपने
एक नए सफर का आग़ाज़
है लाज़मी कि
दिलों में बढ़ी होगी, धड़कन थोड़ी
क्यूँकि बन रही थी,
इक हसीन जोड़ी
बने साक्षी जब धरा आकाश
दो अजनबियों को मिला
जनम जनम का साथ
आपके मन बगिया में
प्रेम पराग से,
जो कली बनी है सुंदर सुमन
ख़ुशबू उसकी इतनी फैले
महके जीवन का हर वसंत
ईश्वर का ऐसा आशीष मिले
खिली रहे, शाश्वत अनंत
- अभिषेक


