कभी ज़रूरत थी इतनी
कि मिल जाए फ़क़त
रोटी, कपड़ा और मकान
अब बदले हालात में
पुरानी हुई ये दास्तान
कभी पैदल चल कर भी
थी चेहरे पर मीठी मुस्कान
है विलासिता की आज ज़िंदगी
और झलकती झूठी शान
कभी मुबारकों के सिलसिले
होते थे त्योहारों की पहचान
अब रौनक फीकी है इनकी
बिन मदिरा, अश्लील गान
कभी बेबस ग़रीबों की खातिर
बन गई टेरेसा "माता" समान
आज दीन-दुखियों की चित्कार पर
नहीं पड़ते हैं हमारे कान
कभी माता-पिता की परिक्रमा कर
गणेश बने, प्रथम पूज्य भगवान
अब तो बोझ है साथ माँ बाप का
संवेदनहीन इतनी हो गई संतान
- अभिषेक


