मत आज़मा मुझे
ऐ ज़िंदगी
हर मुश्किल को तय्यार हूँ
आरज़ू-ए-मसर्रत
अब नहीं कोई
दर्द-शनास हूँ, बेज़ार हूँ
आशना, अपने और अजनबी
छला मुझको सबने कभी
जज़्बातों का शिकार हूँ
अता कर बेशक़
बे-इंतिहा ग़म
दामन फैलाए बेक़रार हूँ
शिकवा नहीं कोई तुझसे
न किसी और की, है ख़ता
मैं ही असली गुनाहगार हूँ
कर फ़ैसला न देर कर
संगीन है जुर्म मेरा
हर सज़ा का हक़दार हूँ
- अभिषेक


