कब रुका है ये ब्रम्हांड कब थमी है ये धरती कब बँधा है पवन का वेग नहीं रुका कभी समुद्र का आवेग ! फिर..., मैं क्यों स्थिर हो गई मैं क्यों ध्रुव हो गई मुझे भी तो चलना था आकाश गंगा बनना था..