यूंही जब झांके आज ये पेड ये पत्ते
नजर आयी कुछ ऐसी खास गहरी बाते
ये पुराने से पत्ते ओढे है गजब की रंगत
क्या सच में बुढापा है ईतना खूबसुरत
कल तक तो ये थे ताजे हरे बस एक रंग
अचानक से शायद बन गये मस्त मलंग
क्या समझ गये ये, पहुंचे है कितनी दूर
शायद जीने लगे है अब जिंदगी को भरपूर
इस पडाव पर भी ईन्होने खुद को जो सवारा है
ईन बुजुर्ग पत्तोंसे बना आज एक नया नजारा है
शायद हमें भी ये कुछ सिखा जा रहे है
बढती ऊम्र का लुत्फ दिखा जा रहे है
ये पके पन्ने जैसे कह रहे है हम से -
ये बुढापा है, कोई सजा नही
ऐसा नही की इस मे मजा नही
हम भी तो अपने अंदाज मे खिलते है
और किस मौसम मे बताओ ऐसे मंजर मिलते है ?

