वो शाम का आलम, ढलते हुए सूरज का पैगाम वो आसमां की लालिमा, वो उभरता हुआ चांद, कुछ तो कहानी है उस सुनहरे आसमां की, उस कहानी में कहीं खो जानी हमारी भी जिंदगानी है। हर वक्त आंखे निहारति, सूरज के ढलने का रास्ता या चांद की रोशन चांदनी या वो शाम का आलम। वो चहल पहल, शोर शराबा, वो पंछियों की चहचहाहट, लौटते हुए घोंसलों की और जैसे ख्वाहिशे होसलो की और। चढ़ता हुआ चन्द्रमा, ढलती हुई शाम हर पल कुछ कहती है, गुनगुनाति है। फिर अचानक शाम गुजर जाती है, और रात छा जाती है, फिर याद आता है, वो शाम का आलम।।