अचानक आज आंगन के उस जामफल के पेड़ पर नजर पड़ी,
जिसके नीचे दस साल पहले पूरी दोपहर बैठे सांप सीढ़ी,लूडो की चाल लड़ी,
नजरें आज फिर उस पल के इन्तजार में वहीं ठहर गई,
जिंदगी के किमती पल गुजर गए जिंदगी फिर ठहर गई,
उन गिलहरियों की और नज़र गई जो तब भी जामफल के लिए लड़ती थी
आज भी जामफल के लिए झगड़ रहीं,
मन उन्हें देख मुस्कुरा उठा, याद वही पुराना झगड़ा मुझे भी आ गया,तु गोट उठा,तु गोट उठा से फिर वो छोटा-सा आंगन गूंज उठा,
आवाज ये मेरे मन की थी,प प बिखर कर बाहर आ गई,
मैंने फिर गाड़ी उठाई और बाजार से सांप सीढ़ी खरीद लाई
फिर भी कुछ तो भूल ही गई सांप सीढ़ी तो बाजार में मिल गई पर वो पल नहीं खरिद पाई,
वो भाई बहनों से हाथापाई,जो अब तमीजदार हो गए, दीदी तुम कब आई मीठे शब्द लेकर सामने आए,
मैं फिर सपने से बाहर आई नई जिंदगी के किस्से सुनाते सुनाते
अपने पुराने पल फिर भूल गई
जिंदगी कुछ देर ठहर गई, फिर उसी राह चल पड़ी