जब मैं मेरी बेटी को सुनाती हूं हमारे किस्से कौन सा खेल हमारा था कौन सा मैदान हमारे हिस्से, वो मुझसे पूंछती की मम्मी तुम तो खेलती थी खुले मैदानों में फिर क्यों बंद दरवाजे हैं मेरे हिस्से मैं खामोश हो विचार करूं मैं क्या जवाब दूं।। जब मैं खुश हो उसे दिखाती पुराने फोटो जिसमें बस ड्राइवर और क्लीनर कंडक्टर भी थे, सहज ही वह पूंछ उठी मम्मी तुम तो सबके साथ घुली-मिली थी फिर क्यों मुझे रोकती हो बात करने से भी, मैं महज़ विचार करूं, की मैं क्या जवाब दूं, मैं क्या जवाब दूं उन मासूम बच्चियों की किलकारियों का, जो चीखें बन गई मैं क्या जवाब दूं,उस पल को जब मेरी बच्ची कुछ पल की भी देरी से पहुंचे घर मैं क्या जवाब दूं ,मेरे मन को जो अपनी बच्ची के लिए हर पल बांधे रहे डर, मैं क्या जवाब दूं, मैं क्या जवाब दूं आखिर मैं क्यों जवाब दूं।।