माला की तारीफ, कभी तारीफ कारिगरी की
माला बिखरी तो परिवर्तित हो गई मोती में,
और दोष आ गया धागे को,
कभी लोग मोती निहारते, कभी जमीन से थोड़ा झुक कर उठाते,
हमने उठा लिया धागा
अब लोग हमें निहारते, कभी चेहरा घुमाते
कभी हम मुस्कुराते, कभी सोचते
फिर एक महाशय पुछते, आपने धागा उठाया
फिर हम मुस्कुराए साथ वो धागा मुस्कुराता
आज वह आज़ाद है , अपनी आजादी का जश्न मनाता
माना आज वह अकेला है, पर माला में धागा भी था, ये लोगों ने आज जाना है
अब धागे को अपनी दिशा ढूंढ उड़ जाना है,
फिर कभी उसे माला नहीं बन जाना है