एक बचपन हमने भी देखा था,
क्या वो हम ही थे ?या आंखों का धोखा था।।
कुछ नहीं चाहिए था हमें हमारी इच्छाओं में तो बस मस्तियों का झरोखा था।।
कुछ नहीं पाया था हमने पर खोया भी कुछ नहीं था,
शौक़ तो हमें ज्यादा मिट्टी का ही था,
सोना चांदी क्या है ये तो हमने जाना भी ना था।।
कौन अपना कौन पराया ये तो हमें किसी ने सिखाया ही ना था,
हमें तो बस प्यार ने अपनाया था।।
ख्वाब आसमान में उड़ने के नहीं , जमीन पर दौड़ने के थे।।
हमें किसी से कुछ भी छिनना नहीं, रो रोकर मांगना आता था।।
कहां गया वो बचपन जो सब कुछ छीन ले गया, आसमान में उड़ने के ख्वाब दिखा गया,
कौन अपना कौन पराया सिखा गया, मिट्टी और सोने चांदी का फर्क समझा गया।।
एक बचपन हमने भी देखा था, क्या वो हम ही थे? या आंखों का धोखा था।।