प्रेम जो राधा - कृष्णा ने किया ,
प्रेम नाम को दोनों ने ही जिया।
प्रेम था तो विवाह क्यों नहीं ,
प्रेम ने दोनों को फिर क्या दिया।।
प्रेम होता है अधूरा विवाह के बिन ,
प्रेम होता है पूरा होने पर मिलन।
प्रेम यूँ परिभाषित ना करते कृष्ण राधा -
प्रेम से रहते अनजान हम आजीवन।।
प्रेम अधिकार नहीं समर्पण माँगता है ,
प्रेम जीतना नहीं हारना भी जानता है ।
प्रेम लक्ष्य सिर्फ विवाह नहीं हो सकता -
प्रेम न्योछावर हो अमर होना जानता है ।।
प्रेम देखना है तो देखो राधा कृष्ण का,
प्रेम जिसने प्रेम को ही दे दी अमरता ।
प्रेम का वरमाला से नहीं कोई सरोकार-
प्रेम नहीं मिटता गर हो दिल पर लिखा ।।


