सृष्टि बनाई जब विधाता ने,

रूप सौंदर्य कोमलता दे ,

रचना की थी नारी की।


सोच कर फिर, एक से भले दो ,

बल दृढ़ता के आशीर्वाद से ,

रचना की पुरुष जाति की।


दोनों से असंतुष्ट विधाता ने ,

कर अर्धनारीश्वर का ध्यान ,

रची रचना एक अनोखी।


दिया डील डोल आदमी सा,

दी औरत सी सहजता ,

और रच दी किन्नर जाति।


आदिकाल से उपेक्षित माने जाते ,

कोख से जन्मे परित्यक्त हो जाते,

समाज उपहास में देता है गाली।


फिर इन्सान का दोगला ये चेहरा,

मंगलकार्यों में बुलाकर नचाना ,

फले घर-घराना-आशीष के सब लोभी।


ईश्वर की यह अद्भुत है रचना ,

करो स्वीकार, दो इसके अधिकार ,

सम्मान में इनके बजाओ अब ताली।


स्वर्ण धीमान 'रीना'नवी मुंबई 'महाराष्ट्र